क्या संस्कारो के नाम पर बच्चो के साथ ये दूरी ठीक है - - - - - - COPY FOR
mangopeople BLOG
टीवी पर ये खबर देख कर काफी दुख हुआ की बच्चों को स्कूल ले कर जाने वाला कैब ड्राइवर लम्बे समय से बच्चों का रेप कर रहा था और माँ बाप को इस बात की जानकारी ही नहीं हुई की उनके तीन बच्चों के साथ ये सब हो रहा है | माँ को तब पता चला जब उन्होंने बच्चों के शरीर पर इंजेक्शन का निशान देखा | इस बात पर आश्चर्य होता है की तीनों बच्चों में से किसी ने भी इस बात की जानकारी कभी भी अपने घर पर नहीं दी | सोचिये की अक्सर बच्चे अपने साथ होने वाली ज्यादातर घटना अपने घर आ कर बताते है की आज मैं गिर गया मुझे चोट आई मुझे उसने मारा मुझे उसने गाली दी आदि आदि फिर क्या वजह थी की बच्चों ने इतनी बड़ी घटना अपने घर पर नहीं बताई | सिर्फ इस मामले में नहीं कई और मामले में भी छोटे बच्चों के साथ ही कई बार बड़े बच्चे भी अपने साथ होने वाली इस तरह की घटना के बारे में या किसी तरह के शारीरिक शोषण के बारे में अपने घर में बताने से बचते है या तब बताते है जब काफी देर हो चुकी होती है | आखिर इसकी वजह क्या है एक कारण तो ये है की ऐसा करने वाला उनको डरता धमकता है और किसी को ना बताने के लिए कहता है पर इससे बड़ा कारण मुझे लगता है ये है कि भारत में संस्कार के नाम पर खास कर माध्यम और निम्न वर्ग अपने और अपने बच्चों के बीच इस मामले में इतनी मोटी दीवार खड़ा कर लेता है जिसे बच्चे पार नहीं कर पाते है | जैसे ही बच्चों के सेक्स एजुकेशन की बात आती है लोग अपना मुँह बनाने लगते है संस्कारो की दुहाई देने लगते है जिसके अनुसार बच्चों को अपने परिवार से, बड़ों या ये कहे की किसी से भी सेक्स जैसे मुद्दों पर बात नहीं करनी चाहिए और इसे पश्चिमी गन्दगी करार दे देते है | मुझे लगता है की शायद वो ना तो इसका मतलब समझते है और ना इसकी ज़रूरतों को | कई बार तो जब बच्चे इस बारे में बड़ों को बताते है तो उनकी बातो को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता है ये सोच लिया जाता है की किसी ने बच्चे से मज़ाक किया होगा और बच्चे ने कुछ गलत ही सोच लिया और कई बार तो उनकी ही गलती निकल दी जाती है खास कर लड़कियों के मामले में जैसे की लड़की ने घर पर आ कर कहा की किसी ने उसी परेशान किया छेड़ा या कमेन्ट पास किया तो सबसे पहले का दिया जाता है की उस तरफ गई ही क्यों ,या कितनी बार कहा है की बे वजह घर से मत निकला करो ,या तुने ही कुछ किया होगा किसी और के साथ तो ये नहीं होता है आदि | इससे होता ये है की अगली बार बच्चे के साथ कुछ होता है तो वो घर पर बताने से डरने लगता है की उसे ही डाट पड़ेगी या सब उसका मज़ाक उड़ायेंगे या उसका घर से निकलना बंद हो जायेगा |
ऐसा नहीं है की हमारी परंपरा में इस तरह के किसी शिक्षा की बात है ही नहीं बच्चों के बड़े होते ही खास कर लड़कियों के मासिक धर्म शुरू होते ही घर की बूढ़ी महिलाएँ बच्ची की माँ से कह देती थी की बच्ची बड़ी हो गई है उसे गलत सही की जानकरी दे दो | ये गलत सही की जानकारी सेक्स एजुकेशन ही होती है पर शायद उतने खुले और बड़े रूप में नहीं पर कुछ जानकरी अपने शरीर में हो रहे परिवर्तन के बारे और इस बारे में की उनको कैसे अपने आप को सुरक्षित रखना है जो काफी सतही होता था | पर आज सिर्फ इतनी जानकारी से काम नहीं बनेगा और ना ही बच्चों के बड़े होने तक रुकने का समय है | अब आप को लगेगा की एक चार पांच साल के बच्चे को इस बारे में कैसे बता सकते है या उसको हम क्या ज्ञान दे सकते है इस बारे में तो मुझे लगता है की सबसे पहले तो अपने बच्चों को बताये उन स्पर्श का अंतर जो आप उसको करते है और जो कोई दूसरा किसी गलत नियत से करता है | वैसे ही जैसे हम उनको बताते है की उसे किसी अजनबी से बात नहीं करनी चाहिए उसके साथ कही नहीं जाना चाहिए और उनकी दी चीजें कभी नहीं खानी चाहिए उसी तरह उन्हें ये बताये की उन्हें भी कभी किसी और को अपना शरीर को हाथ नहीं लगाने देना चाहिए खासकर उनके निजी अंगों को या कोई भी ऐसा करता है तो तुरंत ही आ कर घर पर बताये | इससे कम से कम वो अपने साथ होने वाले किसी दुर्व्यवहार को तुरंत आ कर घर पर बताएगा डरेगा या हिचकेगा नहीं और हम उसे वही रोक सकते है | भारतीय सभ्यता और संस्कार के नाम पर जो बच्चों से इस बारे में दूरी बनाई जा रही है उसे कम से कम इतना तो कम कर देना चाहिए की हमारे बच्चे हमसे कुछ भी कहने या पूछने से डरे नहीं |
मुझे तो लगता है की इस बारे में बच्चों के छोटे छोटे सवालों के जवाब परिवार को ज़रुर देना चाहिए जो अक्सर वो फ़िल्मे टीवी देख कर पूछते है वो भी बिना किसी हिचक के इससे होगा ये की एक तो बच्चे की जिज्ञासा समाप्त हो जाएगी और किसी गलत जगह से कुछ बे मतलब के ज्ञान लेने से बच जायेगा | अगर आप उसके दस में से पांच सवालों के जवाब भी दे देते है तो बाकी पांच सवाल जो उसको समझने लायक नहीं है उसे आप ये कह कर टाल भी सकते है की जब आप बड़े हो जायेंगे तो उनका जवाब समझ पाएंगे तो बच्चा खुद ही शांत हो जायेगा | अब कहने वाले कहेंगे कि देखा ये हमारे संस्कार ना मानने का नतीजा है या धर्म के अनुसार ना चलने का नतीजा है ब्ला ब्ला ब्ला जमाना इसी कारण ख़राब हो गाय है तो मुझे लगता है कि अब इसके लिए हम क्या कर सकते है ये तो ख़राब हो ही चूका है हम इसको तो नहीं सुधार सकते है पर अपने बच्चो की सुरक्षा के लिए जो हमें करना चाहिए और जो हम कर सकते है वो तो करेंगे ही मतलब की उसे तो समझाना ही पड़ेगा की वो कैसे इस ख़राब जमाने में खुद को सुरक्षित रख सकता है भले इसके लिए एक और संस्कार को छोड़ना पड़े |
पर ये सब तो उनके लिए है जो माँ बाप समझदार है जो उनके सवालों के जवाब दे सकते है पर हमारे देश में एक बड़ी संख्या ऐसे माँ बाप की है जो जानते ही नहीं की वो बच्चों को बताये क्या या कम पढ़े लिखे है | इसके लिए तो मुझे लगता है की सरकार और स्कूलों को ही इस बारे में पहल करनी चाहिए पता नहीं वो क्यों इसको शुरू करने में डर रहे है | शायद ये डर भारतीय सभ्यता संस्कृति के रक्षकों का है | मेरा ज्ञान अपनी संस्कृति के बारे में काफी छोटा है मुझे पता ही नहीं था की " काम सूत्र " स्पेनिश में लिखा गया था और " खजुराहो " से ले कर अनेक प्राचीन मंदिर किसी पश्चिमी देश से इम्पोर्ट किये गये थे ..............
नोट -----------मै इस विषय की बड़ी जानकार नहीं हु एक आम और निजी विचार है लेख में और सुधार संभव है आप अपने विचार देकर इसे पूरा कर सकते है |
मुझे तो लगता है की इस बारे में बच्चों के छोटे छोटे सवालों के जवाब परिवार को ज़रुर देना चाहिए जो अक्सर वो फ़िल्मे टीवी देख कर पूछते है वो भी बिना किसी हिचक के इससे होगा ये की एक तो बच्चे की जिज्ञासा समाप्त हो जाएगी और किसी गलत जगह से कुछ बे मतलब के ज्ञान लेने से बच जायेगा | अगर आप उसके दस में से पांच सवालों के जवाब भी दे देते है तो बाकी पांच सवाल जो उसको समझने लायक नहीं है उसे आप ये कह कर टाल भी सकते है की जब आप बड़े हो जायेंगे तो उनका जवाब समझ पाएंगे तो बच्चा खुद ही शांत हो जायेगा | अब कहने वाले कहेंगे कि देखा ये हमारे संस्कार ना मानने का नतीजा है या धर्म के अनुसार ना चलने का नतीजा है ब्ला ब्ला ब्ला जमाना इसी कारण ख़राब हो गाय है तो मुझे लगता है कि अब इसके लिए हम क्या कर सकते है ये तो ख़राब हो ही चूका है हम इसको तो नहीं सुधार सकते है पर अपने बच्चो की सुरक्षा के लिए जो हमें करना चाहिए और जो हम कर सकते है वो तो करेंगे ही मतलब की उसे तो समझाना ही पड़ेगा की वो कैसे इस ख़राब जमाने में खुद को सुरक्षित रख सकता है भले इसके लिए एक और संस्कार को छोड़ना पड़े |
पर ये सब तो उनके लिए है जो माँ बाप समझदार है जो उनके सवालों के जवाब दे सकते है पर हमारे देश में एक बड़ी संख्या ऐसे माँ बाप की है जो जानते ही नहीं की वो बच्चों को बताये क्या या कम पढ़े लिखे है | इसके लिए तो मुझे लगता है की सरकार और स्कूलों को ही इस बारे में पहल करनी चाहिए पता नहीं वो क्यों इसको शुरू करने में डर रहे है | शायद ये डर भारतीय सभ्यता संस्कृति के रक्षकों का है | मेरा ज्ञान अपनी संस्कृति के बारे में काफी छोटा है मुझे पता ही नहीं था की " काम सूत्र " स्पेनिश में लिखा गया था और " खजुराहो " से ले कर अनेक प्राचीन मंदिर किसी पश्चिमी देश से इम्पोर्ट किये गये थे ..............
नोट -----------मै इस विषय की बड़ी जानकार नहीं हु एक आम और निजी विचार है लेख में और सुधार संभव है आप अपने विचार देकर इसे पूरा कर सकते है |