Monday, April 9, 2012

mangopeople: क्या संस्कारो के नाम पर बच्चो के साथ ये दूरी ठीक ह...


क्या संस्कारो के नाम पर बच्चो के साथ ये दूरी ठीक है - - - - - - COPY FOR


mangopeople BLOG
टीवी पर ये खबर देख कर काफी दुख हुआ की बच्चों को स्कूल ले कर जाने वाला कैब ड्राइवर लम्बे समय से बच्चों का रेप कर  रहा था और माँ बाप को इस बात की जानकारी ही नहीं हुई की उनके तीन बच्चों के साथ ये सब हो रहा है | माँ को तब पता चला जब उन्होंने बच्चों के शरीर पर इंजेक्शन का निशान देखा | इस बात पर आश्चर्य होता है की तीनों बच्चों में से किसी ने भी इस बात की जानकारी कभी भी अपने घर पर नहीं दी | सोचिये की अक्सर बच्चे अपने साथ होने वाली ज्यादातर घटना अपने घर आ कर बताते है की आज मैं गिर गया मुझे चोट आई मुझे उसने मारा मुझे उसने गाली दी आदि आदि फिर क्या वजह थी की बच्चों ने इतनी बड़ी घटना अपने घर पर नहीं बताई | सिर्फ इस मामले में नहीं कई और मामले में भी छोटे बच्चों के साथ ही कई बार बड़े बच्चे भी अपने साथ होने वाली इस तरह की घटना के बारे में या किसी तरह के शारीरिक शोषण के बारे में अपने घर में बताने से बचते है या तब बताते है जब काफी देर हो चुकी होती है | आखिर इसकी वजह क्या है एक कारण तो ये है की ऐसा करने वाला उनको डरता धमकता है और किसी को ना बताने के लिए कहता है पर इससे बड़ा कारण मुझे लगता है ये है कि भारत में संस्कार के नाम पर खास कर माध्यम और निम्न वर्ग अपने और अपने बच्चों के बीच इस मामले में इतनी मोटी दीवार खड़ा कर लेता है जिसे बच्चे पार नहीं कर पाते है | जैसे ही बच्चों के सेक्स एजुकेशन की बात आती है लोग अपना मुँह बनाने लगते है संस्कारो की दुहाई देने लगते है जिसके अनुसार बच्चों को अपने परिवार से, बड़ों या ये कहे की किसी से भी सेक्स जैसे मुद्दों पर बात नहीं करनी चाहिए और इसे पश्चिमी गन्दगी करार दे देते है | मुझे लगता है की शायद वो ना तो इसका मतलब समझते है और ना इसकी ज़रूरतों को | कई बार तो जब बच्चे इस बारे में बड़ों को बताते है तो उनकी बातो को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता है ये सोच लिया जाता है की किसी ने बच्चे से मज़ाक किया होगा और बच्चे ने कुछ गलत ही सोच लिया और कई बार तो उनकी ही गलती निकल दी जाती है खास कर लड़कियों के मामले में जैसे की लड़की ने घर पर आ कर कहा की किसी ने उसी परेशान किया छेड़ा या कमेन्ट पास किया तो सबसे पहले का दिया जाता है की उस तरफ गई ही क्यों ,या कितनी बार कहा है की बे वजह घर से मत निकला करो ,या तुने ही कुछ किया होगा किसी और के साथ तो ये नहीं होता है आदि | इससे होता ये है की अगली बार बच्चे के साथ कुछ होता है तो वो घर पर बताने से डरने लगता है की उसे ही डाट पड़ेगी या सब उसका मज़ाक उड़ायेंगे या उसका घर से निकलना बंद हो जायेगा |

   

ऐसा नहीं है की हमारी परंपरा में इस तरह के किसी शिक्षा की बात है ही नहीं बच्चों के बड़े होते ही खास कर लड़कियों के मासिक धर्म शुरू होते ही घर की बूढ़ी महिलाएँ बच्ची की माँ से कह देती थी की बच्ची बड़ी हो गई है उसे गलत सही की जानकरी दे दो | ये गलत सही की जानकारी सेक्स एजुकेशन ही होती है पर शायद उतने खुले और बड़े रूप में नहीं पर कुछ जानकरी अपने शरीर में हो रहे परिवर्तन के बारे और इस बारे में की उनको कैसे अपने आप को सुरक्षित रखना है जो काफी सतही होता था | पर आज सिर्फ इतनी जानकारी से काम नहीं बनेगा और ना ही बच्चों के बड़े होने तक रुकने का समय है | अब आप को लगेगा की एक चार पांच साल के बच्चे को इस बारे में कैसे बता सकते है या उसको हम क्या ज्ञान दे सकते है इस बारे में तो मुझे लगता है की सबसे पहले तो अपने बच्चों को बताये उन स्पर्श का अंतर जो आप उसको करते है और जो कोई दूसरा किसी गलत नियत से करता है | वैसे ही जैसे हम उनको बताते है की उसे किसी अजनबी से बात नहीं करनी चाहिए उसके साथ कही नहीं जाना चाहिए और उनकी दी चीजें कभी नहीं खानी चाहिए उसी तरह उन्हें ये बताये  की उन्हें भी कभी किसी और को अपना शरीर को हाथ  नहीं लगाने देना चाहिए खासकर उनके निजी अंगों को या कोई भी ऐसा करता है तो तुरंत ही आ कर घर पर बताये | इससे कम से कम वो अपने साथ होने वाले किसी दुर्व्यवहार को तुरंत आ कर घर पर बताएगा डरेगा या हिचकेगा नहीं और हम उसे वही रोक सकते है | भारतीय सभ्यता और संस्कार के नाम पर जो बच्चों से इस बारे में दूरी बनाई जा रही है उसे कम से कम इतना तो कम कर देना चाहिए की हमारे बच्चे हमसे कुछ भी कहने या पूछने से डरे नहीं |
  मुझे तो लगता है की इस बारे में बच्चों के छोटे छोटे सवालों के जवाब परिवार को ज़रुर देना चाहिए जो अक्सर वो फ़िल्मे टीवी देख कर पूछते है वो भी बिना किसी हिचक के इससे होगा ये की एक तो बच्चे की जिज्ञासा समाप्त हो जाएगी और किसी गलत जगह से कुछ बे मतलब के ज्ञान लेने से बच जायेगा | अगर आप उसके दस में से पांच सवालों के जवाब भी दे देते है तो बाकी पांच सवाल जो उसको समझने लायक नहीं है उसे आप ये कह कर टाल भी सकते है की जब आप बड़े हो जायेंगे तो उनका जवाब समझ पाएंगे तो बच्चा खुद ही शांत हो जायेगा | अब कहने वाले कहेंगे कि देखा ये हमारे संस्कार ना मानने का नतीजा है या धर्म के अनुसार ना चलने का नतीजा है ब्ला ब्ला ब्ला जमाना इसी कारण ख़राब हो गाय है तो मुझे लगता है कि अब इसके लिए हम क्या कर सकते है ये तो ख़राब हो ही चूका है हम इसको तो नहीं सुधार सकते है पर अपने बच्चो की सुरक्षा के लिए जो हमें करना चाहिए और जो हम कर सकते है  वो तो करेंगे ही मतलब की उसे तो समझाना ही पड़ेगा की वो कैसे इस ख़राब जमाने में खुद को सुरक्षित रख सकता है  भले इसके लिए एक और संस्कार को छोड़ना पड़े |
पर ये सब तो उनके लिए है जो माँ बाप समझदार है जो उनके सवालों के जवाब दे सकते है पर हमारे देश में एक बड़ी संख्या ऐसे माँ बाप की है जो जानते ही नहीं की वो बच्चों को बताये क्या या कम पढ़े लिखे है | इसके लिए तो मुझे लगता है की सरकार और स्कूलों को ही इस बारे में पहल करनी चाहिए पता नहीं वो क्यों इसको शुरू करने में डर रहे है | शायद ये डर भारतीय सभ्यता संस्कृति के रक्षकों का है | मेरा ज्ञान अपनी संस्कृति के बारे में काफी छोटा है मुझे पता ही नहीं था की " काम सूत्र " स्पेनिश में लिखा गया था और " खजुराहो " से ले कर अनेक प्राचीन मंदिर किसी पश्चिमी देश से इम्पोर्ट किये गये थे ..............

नोट -----------मै इस विषय की बड़ी जानकार नहीं हु एक आम और निजी विचार है लेख में और सुधार संभव है आप अपने विचार देकर इसे पूरा कर सकते है |

Sunday, April 8, 2012

7 घटनाएँ, जब नियमों के अधीन रह कर भी क्रिकेट शर्मसार हुआ

  1.    एक श्रीलंकाई गेंदबाज के द्वारा जानबूझ कर नो बॉल फेंकने और भारतीय बल्लेबाजविरेन्द्र    सहवाग को शतक पूरा ना करने देने का मामला काफी तूल पकड रहा है. इस गेंदबाज ने क्रिकेट के नियम का उल्लंघन नहीं किया परंतु "जेंटलमैन खेल" को शर्मसार जरूर किया और
  2.  ऐसी यह पहली घटना नहीं है - फरवरी 1948, भारत-वेस्ट इंडिज़, बम्बई इस टेस्ट मैच के दौरान भारत को जीत के लिए 361 रन चाहिए थे और खेल के 39 मिनट बाकी थे. भारत यह मैच जीत सकता था. परंतु वेस्ट इंडिज़ के खिलाडियों ने खेल को जानबूझ कर धीमा कर दिया. उन्होनें इतना समय बरबाद किया कि भारत मैच जीत नहीं पाया और मात्र 6 रन से मैच ड्रा हो गया.
  3.  फरवरी 1979, इग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया, मेलबर्न तब एकदिवसीय खेलों में 30 यार्ड का नियम नहीं हुआ करता था. ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 4 रन चाहिए थे. इंग्लैंड के कप्तान माइक बियरर्ली ने विकेटकीपर सहित सभी खिलाडियों को बाउंड्री पर लगा दिया था. इसके बाद 30 यार्ड का नियम बना. 1979, ऑस्ट्रेलिया-पाकिस्तान, पर्थ तब क्रिकेट के "हेंडल्ड द बॉल" नियम को ठीक से व्याख्यायित नहीं किया गया था.
  4.  ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज एंड्रु हैल्डिक नोन स्ट्राइकिंग पोज़िशन पर थे.एक पाकिस्तानी खिलाडी ने गेंदबाज की तरफ गेंद लुढकाई जो एंड्रु के पास गई. एंड्रु ने बॉल उठाकर गेंदबार सरफराज नवाज को दी. सरफराज़ नवाज ने तुरंत 'हेंडल्ड द बॉल' की अपील की और अम्पायर ने इसे मान्य रखा.
  5.  1981, ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड, मेलबर्न न्यूज़ीलैंड को आखिरी गेंद पर एक छक्का चाहिए था और वे मैच को टाई कर लेते. ऑस्ट्रेलियन कप्तान ग्रेग चैपल ने अपने भाई ट्रेवरी को कहा कि वे अंडराआर्म गेंद फेंके. ट्रेवर ने गेंद को लुढका कर फेंकी जिस पर छक्का मारना असम्भव था. तब ऐसी गेंद फेंकना नियमानुसार गलत नहीं था, पर इससे खेल भावना को चोट पहुँची.
  6.  2005, ज़िम्बाब्वे-न्यूज़ीलैंड, बुलावायो ज़िम्बाब्वे के बल्लेबाज क्रिस्टोफर मोफू ने रन पूरा किया और तुरंत ही पीच के बीच में आकर अपने साथी खिलाड़ी को 50रन पूरे करने की बधाई दी. कीवी विकेटकीपर ब्रैंडल मैक्कुलम ने क्रिस्टोफर के छोर की गिल्ली उडा दी और रन आउट की अपील की. वह मान्य भी रखी गई. 2006, न्यूज़ीलैंड-श्रीलंका, क्राइस्टचर्च एक बार फिर ऐसी ही घटना. इस बार ब्रैंडलमैक्कुलम ने मुतैया मुरलीधरन को तब रन आउट किया जब वे कुमार संगकारा को शतक की बधाई देने क्रीज़ छोड़कर जा रहे थे. 
  7. 2010, भारत-श्रीलंका, डम्बुला श्रीलंकाई स्पीनर रणदीव ने जानबूझ कर नो-बॉल फेंकी [अपने करीयर की पहली] ताकी सहवाग शतक लगाने से चूक जाए. भारत को जीत के लिए 1 रन चाहिए था और सहवाग को भी शतक पूरा करने के लिए 1 ही रन चाहिए था. श्रीलंकाई गेंदबाज ने जानबूझकर भारत को एक रन दे दिया और सहवाग शतक से चूक गए.

Saturday, April 7, 2012

7 बातें जो सोश्यल नेटवर्किंग साइटों परनहीं लिखनी चाहिए

क्या आपफेसबुक, ओर्कुट और मायस्पेसजैसी सोश्यल नेटवर्किंग साइटों को एक खुली किताब की तरह मानते हैं? क्या आपको लगता है कि आपके द्वारा पोस्ट की गई हर जानकारी मात्र आपके मित्रों तक ही पहुँच रही है? तो एक बार फिर सोचिए.
 सोश्यल नेटवर्किंग साइटें "गुप्त" नहीं होती है. ये खुली किताब की तरह हो सकती है परंतु उनके लिए जो लोगों की जानकारियाँ चुराना चाहते हैं. सोश्यल नेटवर्किंग साइटों पर अपनी प्रोफाइल बनाते समय अत्यंत निजी जानकारियों को गुप्त ही रखना हित  होता है. एक साइबर विशेषज्ञ डेव वाईटलेग ने फेसबुक पर पोस्ट ना करने जैसी 10 जानकारियों के बारे में लिखा है. उनमें से हमने चुनी ऐसी 7 जानकारियाँ जो वाकई में गुप्त रखी जानी चाहिए.
जन्मस्थान और जन्मतिथि - फेसबुक तथा अन्य सोश्यल नेटवर्किंग साइटों पर प्रोफाइल बनाते समय यह जानकारी नहीं लिखनी चाहिए. क्योंकि अमूमन हम ईमेल खातों को बनाते समय गुप्त प्रश्न के जवाब में अपना जन्मस्थान ही चुनते हैं. इस तरह से अपने जन्मस्थान की जानकारी सार्वजनिक कर देने से आप ओनलाइन चोरी का शिकार हो सकते हैं.
अपनी माँ का नाम - अपनी परिवार के सदस्यों की जानकारी हो सके तो ना भरें. विशेष रूप से माँ का नाम, क्योंकि ईमेल खातों तथा अन्य स्थानों पर गुप्त प्रश्न बनाते समय जो एक सवाल आपसे पूछा जाता है वह यह भी होता है.
अपना पता - अपना वास्तविक पता सार्वजनिक ना करें. क्योंकि आप नहीं जानते कि कौन आपकी जानकारियाँ पढ रहाहै.
निजी तस्वीरें पोस्ट ना करें - अपने बच्चों की तथा अपने परिवार के निजी कार्यक्रमों की तस्वीरें पोस्टना करें (फेसबुक जैसी साइट पर आप अपने एल्बम को मात्र मित्रों के साथ साझा कर सकते हैं). हितावह यह है कि आप पिकासा या फ्लिकर जैसी साइटों पर तस्वीरें अपलोड करें जहाँ आप अपने फोल्डर को "प्राइवेट" रख सकते हैं (हालाँकि यह भी एकदम सुरक्षित तो नहीं है).
अपनी छुट्टी की जानकारी - फेसबुक जैसी साइट पर आप छुट्टियों में कितनेदिन शहर से बाहर जा रहे हैं और इस बीचघर पर कोई होगा कि नहीं यह जानकारी सार्वजनिक ना करें.
अभद्र भाषा - सोश्यल नेटवर्किंग साइटों पर किसी पर भी आरोप ना लगाएँ, अभद्र भाषा का उपयोग ना करें और मजाक में ही सही परंतु अपने किसी भी मित्र की तस्वीर पोस्ट ना करें. यह सब कानूनी रूप से आप के खिलाफ जा सकता है. स्विकारोक्ति - किसी बात को लेकर ग्लानी का अनुभव कर रहे हैं और लोगों के सामने उसे कबूल करना चाहते हैं?
 सोश्यल नेटवर्किंग साइटें वह स्थान नहीं है. अपनी निजी बातों को इस तरह की साइटों पर ना लिखें. ये कुछ ऐसी बातें हैं जो आम तौर पर हमारे ध्यान से बाहर चली जाती है और इससे हमारी गोपनियता भंग हो सकती है. ध्यान रखिए सोश्यल नेटवर्किंग साइटें अपने मित्रों और परिवार के सदस्यों के साथ सम्पर्क में रहने का अच्छा माध्यम है. परंतु वह गुप्त नही है