Friday, June 8, 2012

प्यार से लगता है डर

आपको इस दुनिया में ऐसे बहुत लोग मिलेंगे, जो प्यार करने से डरते हैं। दरअसल, ये लोग आसानी से दूसरों पर बिलीव नहीं कर पाते हैं। क्या वजह है कि वे प्यार करने से इतना डरते हैं, चलिए जानते हैं उन्हीं से: 

शिल्पा जिस कॉलेज में पढ़ती है, वहीं एक लड़का उसे दो साल से पसंद करता है। शिल्पा भी जानती है कि वह लड़का बहुत इंटेलिजेंट और अच्छी फैमिली से बिलॉन्ग करता है। इसके बावजूद भी उसने उसका प्रपोजल अक्सेप्ट नहीं किया। इस बारे में वह कहती हैं, 'ना बाबा ना, प्यार और वह किसी से भी। मैं नहीं चाहती कि प्यार के चक्कर में पडूं। जिस गली जाना ही नहीं, वहां के बारे में सोचने का क्या फायदा।' दरअसल, शिल्पा का मानना है कि आज के जमाने में सच्चा प्यार जैसी कोई चीज ही नहीं है। हर लड़का या लड़की उसके साथ जुड़ना चाहता है, जिसके साथ वह अपना फायदा देखता है और वह नहीं जानती कि वह लड़का जो दो साल से उसके पीछे पड़ा है, वह उससे क्या चाहता है। 

केवल टाइमपास 
इस बारे में रिलेशनशिप एक्सपर्ट विख्यात सिंह कहते हैं, 'आज की सोसायटी में प्यार बहुत बदल गया है। अब वैसी फीलिंग्स नहीं रही, जैसे पहले हुआ करती थी। अब हर कोई उससे प्यार करना चाहता है, जो उसके स्टैंडर्ड और लाइफ स्टाइल से मैच करता हो। वहीं, आप किसी को लाइक करते हैं या नहीं, इस बारे में भी कुछ नहीं कह सकते। लड़के- लड़कियों में टाइमपास करने या रिलेशनशिप को इन्जॉयमेंट की तरह लेने जैसी सोच में इन दिनों खूब इजाफा हुआ है।' 

कहीं धोखा तो नहीं प्यार 
12वीं क्लास की स्टूडेंट शगुन कहती हैं, 'मुझे तो यह समझ नहीं आता है कि हर दूसरे लड़के को मुझसे प्यार हो जाता है। हर कोई प्यार की बड़ी-बड़ी डींगे मारता है। इस कंडिशन में यह समझ नहीं आता कि कौन सही बोल रहा है और कौन झूठ।' दरअसल, ट्रू लव जैसी बातें अगर कोई करता है, तो उस पर बिलीव करना मुश्किल होता है। आज 90 पर्सेंट लड़के-लड़कियां तो सिर्फ इन्जॉयमेंट के लिए एक- दूसरे के साथ टाइम स्पेंड करते हैं। उनके लिए प्यार का मतलब साथ में घूमना-फिरना, मूवी देखना, खाना खाना, शॉपिंग करना वगैरह तक ही सीमित होता है। 

अच्छी तरह लें परख 
रिलेशनशिप एक्सपर्ट अनिल शर्मा कहते हैं कि यह सही है कि आप किसी पर बिलीव नहीं कर सकते हैं। लेकिनआपको लगता है कि जो लड़का या लड़की आपको लाइक करती है , वह सही है , तो आप उसे अपनी कसौटी परपरख लें। फिर उसके साथ रिलेशन बनाएं। कई बार होता है कि आपके सामने राइट पर्सन होता है , लेकिन आपउस पर विश्वास ही नहीं कर पाते हैं। उसके साथ थोड़ा टाइम स्पेंड करेंगे , तो आपको पता चल जाएगा कि वहआपसे क्या चाहता है। 

गुमराह ना हों 
कई लड़के , लड़कियों से प्रॉमिस तो कर लेते हैं कि वह शादी करेंगे , लेकिन बाद में मुकर जाते हैं। ज्योति कहतीहैं कि वह पांच साल तक अपने बॉयफ्रेंड के साथ रिलेशनशिप में रही। हर बार कहता था कि शादी करेंगे , लेकिनबाद में वह पलट गया। यानी उसने इतने साल मुझे गुमराह किया और मेरे इमोशंस के साथ भी खेला। साथ हीवह लड़कियों से कहती हैं कि आप जिसके साथ रिलेशनशिप बनाने की सोच रही है , पहले उसका बैकग्राउंड चेककर लें। उसके बाद ही कोई डिसिजन लें। 


COPY BY NAIDUNIYA NEWS

देर का विवाह कितना सही


बढ़ती उम्र में विवाह आकर्षण नहीं बल्कि एकदूसरे की जरूरत बन जाता है। पति पत्नी के इस रिश्ते में प्यार, मनुहार, शारीरिक सौंदर्य का अभाव होता है और आपसी रिश्ते मात्र औपचारिकता बन जाते हैं। हमारे समाज और कानून ने भले ही शादी के लिए न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित की है लेकिन निम्नतम आयु के पश्चात उचित उम्र का निर्धारण करने जैसा महत्तवपूर्ण निर्णय हमारी स्वय की जिम्मेदारी है। जैसे कम उम्र में विवाह के अनेक दुष्परिणाम सामने आते हैं वैसे ही देर के विवाह से भी अनेक नुकसान हो सकते हैं। परिणय बंधन में बंधने जैसा महत्तवपूर्ण कार्य सही समय पर किया जाए तो निश्चित ही जीवन के हर पहलू को शांतिपूर्ण व सुखी रूप से गुजारा जा सकता है।
शारीरिक आवश्यकता: 40 वर्ष के बाद महिलाओं में रजोवृति का समय करीब होता है। जीवन को व्यर्थ जाता देख कर, अपने शरीर पर काबू न रहने पर महिलाएं चि़डचि़डी हो जाती हैं। एक ठोस मजबूत सहारे की चाह के साथ शारीरिक चाहत भी उन्हें विवाह के लिए प्रेरित करती है। स्त्री जिस शारीरिक संतुष्टि की चाहत को युवावस्था में दबा लेती है वह उम्र बढने के साथ तीव्रतर हो जाती है और स्त्री ग्रंथि के उभरने से सेक्स की इच्छा जाग्रत होती है।

ऎसा ही कुछ पुरूषों के साथ भी होता है। अधे़डावस्था में पुरूष पुन: किशोर हो उठते हैं और वे विवाह जैसी संस्था का सहारा ढूंढ़ते हैं। लेकिन देर से किया गया विवाह न तो उन्हे शारीरिक संतुष्टि दे पाता है, साथ ही समय पर विवाह न होने से यौन संबंधी रोगों के बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।
बढ़ती परेशानियां: अधिक उम्र में विवाह होने पर पतिपत्नी दोनों ही परिपक्व हो चुके होते है। दोनों को एकदूसरे के साथ विचारों में तालमेल बिठाने में कठिनाई होती है। 30 पार की महिलाओं में प्रजनन क्षमता घटने लगती है, अत: देर से विवाह होने पर स्त्री के लिए मां बनना कठिन व कष्टदायी होता है। साथ ही एक पूर्ण स्वस्थ शिशु की जन्म की संभावनाओं में कमी आने लगती है। ढ़लती उम्र में जिंदगी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबने लगती है और विवाह आनंद का विषय होने के बजाय साथी को ढ़ोना हो जाता है।
यदि अधे़डावस्था में विवाहित पतिपत्नी के पूर्व साथी से बच्चों हैं तो उन दो परिवारों के बच्चों में आपसी मनमुटाव हो जाता है। अधिक उम्र में विवाह होने पर विवाहित दंपत्तियों में असुरक्षा की भावना आ जाती है। दोनों को एकदूसरे पर भरोसा नहीं होता। असुरक्षा की यह भावना पतिपत्नी में विश्वास के बजाय शक और दूरी पैदा कर देती है।
देर से विवाह करने वाले स्त्रीपुरूषों के प्रति समाज का रवैया भी कुछ संदेहास्पद और मजाक का विषय बन जाता है। समाज में विवाह को युवावस्था की जरूरत माना जाता है न की अधे़डावस्था को।
देर का विवाह मतलब समझौता: जो स्त्रीपुरूष अपनी युवावस्था रिश्तों को नापसंद करने में गुजार देंते है उन्हे बाद में अपनी सभी चाहतों से समझौता करना प़डता है। ढ़लती उम्र में जैसा साथी मिलें उसी में संतोष करना प़डता है। अपनी चाहत या पसंद उम्र के इस प़डाव पर आ कर कोई मायने नहीं रखती। अधे़डावस्था में विवाह एक जरूरत बन जाती है, जिस के लिए पतिपत्नी को हर कदम पर समझौता करना प़डता है। इस विवाह का उद्देश्य मात्र एक सहारा होता है, जो वास्तव में इस उम्र में शारीरिक अक्षमताओं की वजह से सहारा बनने के बजाय बोझ ही बनता है।
ढ़लती उम्र का अहसास: युवावस्था में पतिपत्नी की अठखेलियां, उन का रूठना, मनाना और प्रेमालाप इन प्रौढ़ावस्था के विवाहितों में दूर-दूर तक नजर नहीं आता। युवक की खत्म होती शारीरिक क्षमताएं, पस्त होता रोमाचं और उत्साह, साथ ही नारी के नारीसुलभ आकर्षण का अभाव उन में एक दूसरे से प्यार, लगाव व रूचि को खत्म कर देता है। अधे़डावस्था में युवाओं जैसा उत्साह, रोमाचं व शारीरिक क्षमता नहीं रहती तब उन का एकमात्र ध्येय अपने अकेलेपन को दूर करना होता है, जिससे जीवन में नीरसता आ जाती है और दंपत्ति को अपनी ढ़लती उम्र का अहसास सताने लगता है।
अधे़डावस्था के विवाह में उत्साह व जोश की कमी के कारण जीवन में आनंद नहीं रहता और वह रिश्ता एक जरूरत और औपचारिकता बन कर रह जाता है। अधे़डावस्था में विवाह होने पर दंपत्ति के पास भविष्य के लिए योजनाएं बनाने का न तो समय होता है और ना ही उनमें उनको पूरा करने का शारीरिक सामर्थय होता है। ढ़लती उम्र का अहसास उनके जीवन मे गंभीरता व नीरसता भर देता है और परिवार में हंसीमजाक, ल़डना-झग़डना व रूठना-मनाना जैसे उत्सवों का कोई नाम नहीं होता।

Tuesday, June 5, 2012

विमान यात्रा के दौरान "थर्मोमीटर" रखना क्यों होता है वर्जित?

क्या आपने कभी गौर किया है कि विमानयात्रा के दौरान जो कुछ संसाधन आप अपने साथ नहीं ले जा सकते उसमें परम्परागत थर्मोमीटर भी शामिल है. अब एक थर्मोमीटर से क्या नुकसान हो सकता है?

परम्परागत थर्मोमीटर में पारा होता है जो कि जहरीला होता है. इसलिए सामान्य रूप से यह बात समझ में आती है कि थर्मोमीटर को लेकर हवाई यात्रा करने वाले यात्री से परेशानी उत्पन्न हो सकती है. परंतु बात मात्र इतनी सी ही नहीं है.

थर्मोमीटर मे मौजूद पारा स्वयं विमान के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. विमान की बॉडी टाइटेनियम और एल्यूमीनियम से बनी होती है. एल्यूमीनियम एक ऐसी धातु है जो ऑक्सिजन के साथ तुरंत सम्पर्क कायम कर रसायनिक प्रक्रिया शुरू कर देती है. इससे हवा में मौजूद ऑक्सिजन एल्यूमीनियम की सतह को नुकसान पहुँचा सकता है.

सामान्यत: ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि जैसे ही ऐसी कोई प्रतिक्रिया शुरू होती है एल्यूमीनियम की परत के ऊपर ओक्साइड की पतली परत जम जाती है और इससे एल्यूमीनियम की परत को नुकसान नहीं पहुँचता. परंतु पारा यहाँ खलनायक बन सकता है.

पारे का एक गुणधर्म ओक्साइड पर हमला करना भी है. यदि पारा ओक्साइड की परत के सम्पर्क में आए तो उसे नुकसान पहुँचा सकता है. दूसरी तरफ पारा एक जगह टिकता भी नहीं इसलिए व्यापक नुकसान की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है. इसके बाद ऑक्सिजन एल्यूमीनियम की परत को भी नुकसान पहुँचाना शुरू कर देता है. इससे विमान की बॉडी को भारी नुकसान हो सकता है.

एक और बात - इस तरह की रसायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न गर्मी से विमान के फ्यूल टैंक में धमाका भी हो सकता है.


COPY BY TARAKASH

Tuesday, May 15, 2012

क्यों हो जाता है ये प्यार?

क्या मनुष्य स्वभाव से एकनिष्ठ है? नहीं है। क्यों नहीं है? इसलिए नहीं है कि कोई भी इंसान परफ़ेक्ट है। कोई नहीं है, जिसमें दुनिया के सारे गुण हों। न आप ऐसे हैं, न मैं, न कोई और। एक शख्स में कुछ गुण है तो दूसरे में कोई और गुण हैं। इसलिए आपको कभी कोई अच्छा लगता है तो कभी कोई और। और इस तरह आप एकसाथ या एक के बाद एक कई लोगों से प्यार करते हैं। हां ,यह सही है कि इन सभी से प्यार एक जैसी गहराई से नहीं होता। प्रेम आमतौर पर पांच कारणों से होता है - रूप, व्यवहार, गुण, साथ और सेक्स। सभी आपको सुख देते हैं। 

सुंदर रूप 
एक सुंदर चेहरा या बदन आंखों को सुख देता है। कोई अगर कटरीना कैफ का फैन है और उसकी तस्वीरें दीवारों पर लगाता है तो उसका कारण यही है कि कटरीना का सुंदर चेहरा उसे सुख देता है। वह जवाब में कटरीना से सीधे कुछ नहीं पा रहा, यह अलग बात है, लेकिन वह जो दीवानगी शो कर रहा है, वह एक तरह का प्यार ही है। ऑफिस में कुछ शक्लें हमें अच्छी लगती हैं तो इसका मतलब यह कि हम शक्ल के कारण उस शख्स से प्यार करते हैं। राह चलते भी हमें कोई सूरत भली लग जाती है। यह एक लम्हे का प्यार है। 

उम्दा बर्ताव 
अच्छे बर्ताव के कारण भी कोई एक या कई लोग आपको प्यारे लग सकते हैं। आप अपने पति या पत्नी से कितने ही संतुष्ट क्यों न हों लेकिन अगर दफ्तर में कोई कलीग आपको बिना किसी मतलब के लंच टाइम में पराठा या इडली शेयर करने का ऑफर दे तो उसके व्यवहार के आकर्षण को आप किस तरह नकार पाएंगे? उसका ऑफर बताता है कि उसे आपका साथ पसंद है, वह आपको खुश करना चाहता/चाहती है, और इसीलिए वह आपको कुछ दे रहा/रही है। अब अगर आप भी एक सेंसिटिव शख्स हैं तो आप भी उसे कुछ देंगे ही। यह देना एक कप स्पेशल चाय के रूप में हो सकता है। लेकिन एक बात यहां ध्यान देने की है - अगर यह देना सिर्फ कर्ज उतारने के लिए है तो यह एक सौदा होगा। 

बेहतर गुण 
गुण की वजह से भी प्यार हो सकता है, बशर्ते आपको उस गुण की कद्र हो। और अगर वह गुण ऐसा हो, जो आपके जीवनसाथी में नहीं है तो यह बहुत ही तगड़ा आधार बन सकता है एक्स्ट्रा-मैरिटल प्रेम का। किसी का पति अगर रात को शराब पीकर आता हो, गाली-गलौज करता हो, पत्नी और बच्चों को पीटता हो, तो वह परेशान स्त्री पड़ोस के उस सज्जन पुरुष को क्यों नहीं सराहेगी, जो वक्त पर घर आता हो और पत्नी और बच्चों के साथ घूमने निकलता हो! 

संग-साथ 
साथ रहने से भी आत्मीयता पैदा होती है। शादी के बाद साथ रहते-रहते जो प्रेम पैदा होता है, वह साथ रहने से भी है। वैसे साथ रहना जहां प्रेम को जन्म देता है, वहीं वह रिश्ते में उकताहट का कारण भी है। प्रेम इस वजह से कि बहुत-कुछ मिल रहा है और बोरियत इस वजह से कि नया कुछ नहीं मिल रहा है। 

सेक्स 
सेक्स के कारण आकर्षण के बारे में ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं। यह ज्यादा तीव्र होता है क्योंकि इसके साथ बायलॉजिकल कारण जुड़े रहते हैं। लेकिन इसे हम केवल देह का मामला नहीं मान सकते। यह पूरी तरह शख्स से जुड़ा है वरना इंसान प्रेम किसी से करता, सेक्स किसी और से।


COPY BY NAVBHARATYIMES

Sunday, April 29, 2012

हिन्दू किसे कहते हैँ और हिन्दुस्तान 'इण्डिया' कैसे हुआ?

'हिन्दु' शब्द जातिवाचक न होकर स्थानवाचक और बहुत ही प्राचीन शब्द है।प्राचीन शास्त्र कहते हैँ कि हिन्द महासागर के पूर्वी सिरे पर बसे भारत देश को अपनी मात्र एवम पित्र भूमि मानने वाला व्यक्ति हिन्दू है।धार्मिक मान्यताओँ के अनुसार वेद-पाठ करने वाला, उत्तम आचरण युक्त,देवी-देवताओँ का पूजन करने वाला हिन्दु की श्रेणी मेँ आता है। हिन्दुस्तान का मूल निवासी चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो 'हिन्दू' कहा जा सकता है। 'हिन्दू' से 'हिन्दिया' का H साइलैन्ट होकर 'इन्दिया' हुआ जिसका अपभ्रंश होकर 'इन्डिया' (INDIA) बन गया तो यहाँ के निवासी को 'इण्डियन' कहने लगे।

Friday, April 13, 2012

Charge, Cap, Fag Staff, Hoist Rope, Fly... ये सारे शब्द राष्ट्रीय झंडों से जुडे हुए हैं.

Charge, Cap, Fag Staff, Hoist Rope, Fly... ये सारे शब्द राष्ट्रीय झंडों से जुडे हुए हैं. हर झंडे में एक चार्ज क्षैत्र होता है. इसके अलावा हर झंडे को कई अन्य क्षैत्रों के द्वारा चिह्नित भी किया जाता है. आइए जानें इनके बारे में.चार्ज का अर्थ होता है झंडे का मुख्य भाग, यानी कि वह भाग जिससे झंडे की त्वरित पहचान हो सके. हमारे राष्ट्रीय झंडे की बात करें तो इसमें तीन रंग की पट्टियाँ है केसरी, सफेद और हरा. परंतु ठीक इन्हीं रंगों और पैटर्न के तीन और राष्ट्रीय झंडे भीहैं इसलिए ये चार्ज क्षैत्र नहीं हो सकते. इसलिए हमारे राष्ट्रीय झंडे का चार्ज क्षैत्र है "अशोक चक्र'. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हमारे झंडे का मुख्य भाग है अशोक चक्र जो बाकी झंडों से उसको अलग करता है.इसके अलावा भी कई चिह्नित क्षैत्र होते हैं. झंडे को जिस स्तम्भ पर लगाया जाता है उसके शीर्ष भाग को Cap कहते हैं. स्तम्भ को Flag Staff कहते हैं. झंडे को हमेशा सीधा ही लगाया जाए इसके लिए ऊपर की तरह एक दट्टी लगाई जाती है जिसे Toggle कहते हैं. झंडे में लगने वाली रेशमी डोर को Hoist Rope कहते हैं. झंडे के स्तम्भ की तरफ रहने वाले अर्ध भाग को Hoist और स्तम्भ से दूर रहकर हवा में उडने वाले दूसरे अर्ध भागको Fly कहते हैं. Fly भाग को ही सलामी दी जाती है.सवाल यह है कि जब झंडे को सही तरह से ही लगाया जाए इसके लिए उसके ऊपरी भाग पर टोगल लगाई जाती है तो भी कई बार झंडा ऊल्टा क्यों फहरा दिया जाता है? जवाब सर्वविदित है. ऐसा मात्र दो वजहों से होता है - लापरवाही या जानबुझ कर की गई प्रवृति.

Monday, April 9, 2012

mangopeople: क्या संस्कारो के नाम पर बच्चो के साथ ये दूरी ठीक ह...


क्या संस्कारो के नाम पर बच्चो के साथ ये दूरी ठीक है - - - - - - COPY FOR


mangopeople BLOG
टीवी पर ये खबर देख कर काफी दुख हुआ की बच्चों को स्कूल ले कर जाने वाला कैब ड्राइवर लम्बे समय से बच्चों का रेप कर  रहा था और माँ बाप को इस बात की जानकारी ही नहीं हुई की उनके तीन बच्चों के साथ ये सब हो रहा है | माँ को तब पता चला जब उन्होंने बच्चों के शरीर पर इंजेक्शन का निशान देखा | इस बात पर आश्चर्य होता है की तीनों बच्चों में से किसी ने भी इस बात की जानकारी कभी भी अपने घर पर नहीं दी | सोचिये की अक्सर बच्चे अपने साथ होने वाली ज्यादातर घटना अपने घर आ कर बताते है की आज मैं गिर गया मुझे चोट आई मुझे उसने मारा मुझे उसने गाली दी आदि आदि फिर क्या वजह थी की बच्चों ने इतनी बड़ी घटना अपने घर पर नहीं बताई | सिर्फ इस मामले में नहीं कई और मामले में भी छोटे बच्चों के साथ ही कई बार बड़े बच्चे भी अपने साथ होने वाली इस तरह की घटना के बारे में या किसी तरह के शारीरिक शोषण के बारे में अपने घर में बताने से बचते है या तब बताते है जब काफी देर हो चुकी होती है | आखिर इसकी वजह क्या है एक कारण तो ये है की ऐसा करने वाला उनको डरता धमकता है और किसी को ना बताने के लिए कहता है पर इससे बड़ा कारण मुझे लगता है ये है कि भारत में संस्कार के नाम पर खास कर माध्यम और निम्न वर्ग अपने और अपने बच्चों के बीच इस मामले में इतनी मोटी दीवार खड़ा कर लेता है जिसे बच्चे पार नहीं कर पाते है | जैसे ही बच्चों के सेक्स एजुकेशन की बात आती है लोग अपना मुँह बनाने लगते है संस्कारो की दुहाई देने लगते है जिसके अनुसार बच्चों को अपने परिवार से, बड़ों या ये कहे की किसी से भी सेक्स जैसे मुद्दों पर बात नहीं करनी चाहिए और इसे पश्चिमी गन्दगी करार दे देते है | मुझे लगता है की शायद वो ना तो इसका मतलब समझते है और ना इसकी ज़रूरतों को | कई बार तो जब बच्चे इस बारे में बड़ों को बताते है तो उनकी बातो को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता है ये सोच लिया जाता है की किसी ने बच्चे से मज़ाक किया होगा और बच्चे ने कुछ गलत ही सोच लिया और कई बार तो उनकी ही गलती निकल दी जाती है खास कर लड़कियों के मामले में जैसे की लड़की ने घर पर आ कर कहा की किसी ने उसी परेशान किया छेड़ा या कमेन्ट पास किया तो सबसे पहले का दिया जाता है की उस तरफ गई ही क्यों ,या कितनी बार कहा है की बे वजह घर से मत निकला करो ,या तुने ही कुछ किया होगा किसी और के साथ तो ये नहीं होता है आदि | इससे होता ये है की अगली बार बच्चे के साथ कुछ होता है तो वो घर पर बताने से डरने लगता है की उसे ही डाट पड़ेगी या सब उसका मज़ाक उड़ायेंगे या उसका घर से निकलना बंद हो जायेगा |

   

ऐसा नहीं है की हमारी परंपरा में इस तरह के किसी शिक्षा की बात है ही नहीं बच्चों के बड़े होते ही खास कर लड़कियों के मासिक धर्म शुरू होते ही घर की बूढ़ी महिलाएँ बच्ची की माँ से कह देती थी की बच्ची बड़ी हो गई है उसे गलत सही की जानकरी दे दो | ये गलत सही की जानकारी सेक्स एजुकेशन ही होती है पर शायद उतने खुले और बड़े रूप में नहीं पर कुछ जानकरी अपने शरीर में हो रहे परिवर्तन के बारे और इस बारे में की उनको कैसे अपने आप को सुरक्षित रखना है जो काफी सतही होता था | पर आज सिर्फ इतनी जानकारी से काम नहीं बनेगा और ना ही बच्चों के बड़े होने तक रुकने का समय है | अब आप को लगेगा की एक चार पांच साल के बच्चे को इस बारे में कैसे बता सकते है या उसको हम क्या ज्ञान दे सकते है इस बारे में तो मुझे लगता है की सबसे पहले तो अपने बच्चों को बताये उन स्पर्श का अंतर जो आप उसको करते है और जो कोई दूसरा किसी गलत नियत से करता है | वैसे ही जैसे हम उनको बताते है की उसे किसी अजनबी से बात नहीं करनी चाहिए उसके साथ कही नहीं जाना चाहिए और उनकी दी चीजें कभी नहीं खानी चाहिए उसी तरह उन्हें ये बताये  की उन्हें भी कभी किसी और को अपना शरीर को हाथ  नहीं लगाने देना चाहिए खासकर उनके निजी अंगों को या कोई भी ऐसा करता है तो तुरंत ही आ कर घर पर बताये | इससे कम से कम वो अपने साथ होने वाले किसी दुर्व्यवहार को तुरंत आ कर घर पर बताएगा डरेगा या हिचकेगा नहीं और हम उसे वही रोक सकते है | भारतीय सभ्यता और संस्कार के नाम पर जो बच्चों से इस बारे में दूरी बनाई जा रही है उसे कम से कम इतना तो कम कर देना चाहिए की हमारे बच्चे हमसे कुछ भी कहने या पूछने से डरे नहीं |
  मुझे तो लगता है की इस बारे में बच्चों के छोटे छोटे सवालों के जवाब परिवार को ज़रुर देना चाहिए जो अक्सर वो फ़िल्मे टीवी देख कर पूछते है वो भी बिना किसी हिचक के इससे होगा ये की एक तो बच्चे की जिज्ञासा समाप्त हो जाएगी और किसी गलत जगह से कुछ बे मतलब के ज्ञान लेने से बच जायेगा | अगर आप उसके दस में से पांच सवालों के जवाब भी दे देते है तो बाकी पांच सवाल जो उसको समझने लायक नहीं है उसे आप ये कह कर टाल भी सकते है की जब आप बड़े हो जायेंगे तो उनका जवाब समझ पाएंगे तो बच्चा खुद ही शांत हो जायेगा | अब कहने वाले कहेंगे कि देखा ये हमारे संस्कार ना मानने का नतीजा है या धर्म के अनुसार ना चलने का नतीजा है ब्ला ब्ला ब्ला जमाना इसी कारण ख़राब हो गाय है तो मुझे लगता है कि अब इसके लिए हम क्या कर सकते है ये तो ख़राब हो ही चूका है हम इसको तो नहीं सुधार सकते है पर अपने बच्चो की सुरक्षा के लिए जो हमें करना चाहिए और जो हम कर सकते है  वो तो करेंगे ही मतलब की उसे तो समझाना ही पड़ेगा की वो कैसे इस ख़राब जमाने में खुद को सुरक्षित रख सकता है  भले इसके लिए एक और संस्कार को छोड़ना पड़े |
पर ये सब तो उनके लिए है जो माँ बाप समझदार है जो उनके सवालों के जवाब दे सकते है पर हमारे देश में एक बड़ी संख्या ऐसे माँ बाप की है जो जानते ही नहीं की वो बच्चों को बताये क्या या कम पढ़े लिखे है | इसके लिए तो मुझे लगता है की सरकार और स्कूलों को ही इस बारे में पहल करनी चाहिए पता नहीं वो क्यों इसको शुरू करने में डर रहे है | शायद ये डर भारतीय सभ्यता संस्कृति के रक्षकों का है | मेरा ज्ञान अपनी संस्कृति के बारे में काफी छोटा है मुझे पता ही नहीं था की " काम सूत्र " स्पेनिश में लिखा गया था और " खजुराहो " से ले कर अनेक प्राचीन मंदिर किसी पश्चिमी देश से इम्पोर्ट किये गये थे ..............

नोट -----------मै इस विषय की बड़ी जानकार नहीं हु एक आम और निजी विचार है लेख में और सुधार संभव है आप अपने विचार देकर इसे पूरा कर सकते है |